छात्र-विर्य, ब्रह्मतेज, मूर्तिमान स्वामी विवेकानन्द आये हैं आज...
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Wednesday, April 26, 2006

स्वामी विवेकानन्द जी का जीवन

परमात्मा की कृपा पर मेरा अखण्ड विश्वास है। वह कभी टूटने वाला भी नहीं। धर्मग्रन्थो पर मेरी अटूट श्रध्दा है। परन्तु प्रभु की इच्छा से मेरे गत छः सात वर्ष निरन्तर विभिन्न बिघ्न-बाधाओं से लडते हुए बीते। मुझे आदर्श शास्त्र प्रात्त हुआ है; मैंने एक आदर्श महापुरुष के दर्शन किये हैं, फिर भी किसी वस्तु का अन्त तक निर्वाह मुझसे नहीं हो पाता, यही मेरे लिए बडे कष्ट की बात है। ... कलकत्ते में मेरी माँ और दो भाई रहते हैं। मैं सबसे बडा हूँ। दूसरा भाई एफ. ए. परीक्षा की तैयारी कर रहा है और तीसरा अभी छोटा है। वे लोग पहले काफ़ी सम्पन्न थे, पर मेरे पिता की मृत्यु के बाद उनका जीवन कष्टमय हो गया है। कभी-कभी तो उन्हे भूखा रहना पडता है। सबसे बडी बात तो यह है कि उन्हे असहाय पाकर कुछ समन्धियों ने उन्हे पैतृक घर से भी निकाल दिया है। कुछ भाग तो हाईकोर्ट में मुक़दमा लडकर पुनः प्राप्त कर लिया गया है, परन्तु वे मुक़दमेबाज़ी के कारण धनहीन हो गये हैं। कलकत्ते के पास रहकर मुझे अपनी आँखो उनकी दुरवस्था देखनी पडती हैं। उस समय मेरे मन में रजगुण जाग्रत हो उठता है और मेरा अंहभाव कभी - कभी उस भावना में परिणत हो जाता है, जिसके कारण कार्यक्षेत्र में कुद पडने की प्रेरणा होती है। ऐसे क्षणों में मैं अपने मन में एक भयंकर अन्तर्द्वन्द्व अनुभव करता हूँ। ...अब उनका मुक़दमा समाप्त हो चुका है। आशीर्वाद दीजिए कि कुछ दिन कलकत्ते में ठहर कर उन सब मामलों को सुलझाने के बाद मैं इस स्थान (कलकत्ता) से सदा के लिए विदा ले सकुँ।
( वि.स. १/३३७, ४ जुलाई, १८८९ )

5 Comments:

Anonymous Anonymous said...

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5:44 PM  
Anonymous Anonymous said...

I like it! Keep up the good work. Thanks for sharing this wonderful site with us.
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10:25 PM  
Blogger राजेंद्र माहेश्वरी said...

शिक्षा का नििश्चित लक्ष्य हो - आज की शिक्षा की सबसे बडी खामी यह हैं कि इसके सामने अनुसरण करने के लिये कोई निश्चित लक्ष्य नहीं हैं। एक चित्रकार अथवा मूर्तिकार जानता हैं कि उसे क्या बनाना हैं तभी वह अपने कार्य में सफल हो पाता हैं । आज शिक्षक को यह स्पष्ट नही हैं वह किस लक्ष्य को लेकर अध्यापन कार्य कर रहा है। सभी प्रकार की शिक्षा का एक मात्र उद्धेश्य मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण करना हैं इसके लिये वेदान्त के दर्शन को ध्यान में रखते हुए मनुष्य निर्माण की शिक्षा प्रदान की जानी चाहिये।-स्वामी विवेकानन्द जी

6:13 PM  
Anonymous Yadnakant Jagdale said...

आप इस साइट द्वारा बहोत अच्छा काम कर रहे हो, कृपया आगे भी जारी रखे हम आपके साथ है!

11:37 PM  
Blogger रुपेश कुमार तिवारी said...

आप सभी का अनेक अनेक धन्यवाद।

ये मेरा प्रयास है की मई स्वामी जी के सन्देश को हिंदी में लिखूं क्यूंकि जब कभी मई उनके विषय में कुछ जानना चाहता था तो हमेशा इंग्लिश में ही मुझे मिलती थी..

ईश्वर हमें सद मार्ग दर्शाये।

4:45 PM  

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